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Hymn No. 400 | Date: 06-Oct-1998
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सार्थ है ये जीवन तेरे बिना, ललता रहता है हर पल चिता की अग्नि में ।
सार्थ है ये जीवन तेरे बिना, ललता रहता है हर पल चिता की अग्नि में ।
कोरी है श्रध्दा हमारी तेरे लिये, लालसायें रोक लेती है हमारी भावनाओं को।
घिरे है हम वासनाओं के सागर से, मन की हवस का शिकार होता रहता है दिल हमारा।
अनगिनत इच्छाओं और कुकर्मा है हमारें, इन सबके बीच तेरी दया से प्रीत का दीप –
जल उठता है पल दोष पल के लिये ।
हक तो नहीं रखता तुझसे कुछ कहनें को, पर तेरा विशाल ह्रदय देखकें कह जाता हूँ बहूत कुछ
दुःसाहस कहनें की करता हूँ, बहुत मजा आता है तेरी बात और तेरा सत्संग करकें।
परम् आनंद जो होगा वो होगा, हमें इसमें भी परम् आनंद आता है ।
तोड़ा है हमनें कई बार अपने बनायें नियमों की, ऐं दिलब सीखा दे तू हमें दिल की मौजें पे तैरना।
हमें हमारे मन के जाल में कर दें मुक्त, लुफ्त उठानें लग जायेगे हम हमारें मनोभावों तरना को।
तोड़ देना सीखा दें थोथी वर्जनाओं को, निर्लिप्त रहूँ तेरे संसार के हर दायीत्वों को निभातें हुये ।
इस तन के भीतर कहीं दूर सोया हूँ मैं, झिंझोड के जगा दें मेरे आंतरआत्मा को, मन का हर भेद मिट जाये।
पृथक होनें का दिल करता है मैं – मैं से, तेरी कृपा चाहते है तेरे चरणों में शीश नवाकें न उठानें की।
- डॉ.संतोष सिंह
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