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Hymn No. 401 | Date: 06-Oct-1998
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दुखी होते है हम, हमारें अपने दुखो से।
दुखी होते है हम, हमारें अपने दुखो से।
बैचेन होता है हमारा मन, हर पल पैदा होनें वाली इच्छाओं से ।
काम की ज्वाला सुलगती रहती हें इस तन – मन में, मौका पातें ही भडक उठती है।
सहार में लगा बैठते है दिल, अपने सृजन की ताकत को पहचान पातें नहीं ।
ओरों को सताते है हम, पर खुदही खुदको सताते है ।
तुझसे कसमें वादें कीसें हजारों – हजार बार, मौका पातें ही तोड़ा है दमित इच्छाओं के लिये।
अपने गुनाहो के लिये कई बार पश्चाताप के आँसू है बहायें ।
मौका पाते ही लोभ के वश में होके कर डालते है नया गुनाह ।
एक ढुंडो हजार मिलती है इतनी सारी समायी है कमियाँ हममें ।
जार – जार रोता है दिल मेरा, समझ नहीं पाता क्या करूं मैं ।


- डॉ.संतोष सिंह