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Hymn No. 412 | Date: 10-Oct-1998
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तूझसें परें कुछ ना है जो कुछ भी है इस संसार में वो सब कुछ तेरा है ।
तूझसें परें कुछ ना है जो कुछ भी है इस संसार में वो सब कुछ तेरा है ।
इतना सब कूछ होके, भी ना है तू हक जताता, अपने आपको तू है दास बताता।
तुझमें है असीम ताकत कीतनें ब्रम्हाण्डों को तू रचता है और करता विध्वंस।
पर सदा प्रेम का ही गीत गाता, संसार के हर नियम् को तू सहजता से निभाता।
जो कार्य कोई भी ना है कर सकता, वो तू पल भर में है कर दिखाता।
इतना सब कुछ होतें हुये साधारण से लोगों के संग साधारण से तू जीता है ।
प्रकृति भी बनायें तेरे नियमों पे है चलती, तूने बनाया मानव को अपने अनुरूप।
मानव को दी ढेर सारी सत्ता, फिर भी क्यों हो जाता है तुझसे विमुख वो।
उचल-पुथल करता रहता है वो, फिर भी तू शांत बना रहता है ।


- डॉ.संतोष सिंह