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Hymn No. 414 | Date: 11-Oct-1998
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तू जानता है सब कूछ, क्यों है वदा हमारें भाग्य में।
तू जानता है सब कूछ, क्यों है वदा हमारें भाग्य में।
सब कूछ बदल सकता हें क्षण भर में बस तेरी रजा हो।
सजा तो पाते है हम हमारें कर्मों की।
जब – जब दूर हुये तुझसे, मुश्किलों से घिंरा हुआ पाया खुदको।
एक बार हीं नहीं तूने सम्भाला है हमकों कई - कई बार।
संम्भलते ही होश – हवाश गुम करके खो जाते है कर्मों के संसार में ।
तूने हमें कीसी बात पे कभी ना रोका – टोका।
तेरी अवमानना किया कई बार, फिर भी शरण दिया अपने दर पे।
निस्वार्थ तू है, निस्वार्थ तेरा प्रेम, स्वार्थी तो हम है ।
मिन्नत मेंरी मान लें एक और तू, सदा के लिये शरण दें दें चरणों में अपने ।


- डॉ.संतोष सिंह