VIEW HYMN

Hymn No. 417 | Date: 12-Oct-1998
Text Size
उठते है मन में कई - कई सवाल, हल हो जातें है तुझसे मुलाकात होतें हीं।
उठते है मन में कई - कई सवाल, हल हो जातें है तुझसे मुलाकात होतें हीं।
कहना चाहता हूँ मैं अपना सब कूछ, बिन सुनें जान लेता है वो सब कुछ ।
यथार्थ के संग जुडके दिल को अमीर बनता, मन लग जाता है अपने आप तुझमें ।
तेरे संग होनें से नीसमय जीवन में गीत फूटते है मधुर संगीत के संग।
अंग – अंग तेरे चरणों में करबद्ध हो जाता, उस पल तेरे सिवाय कूछ ना हूँ चाहता ।
आनंद आता है कहीं दूर भीतर से, खुशीयों का सैलास है उमडता।
पक्षीयों की तरह चहचहानें का मन है करता, डाल – डालयें, फूदक फूदकें तेरा गीत मानें को है मन करता।
कूछ ना है बदलता दुनिया वैसी के वैसी ही रहती, तेरी कृपा से हम बदल जाते है।
निराकरण हो जाता है, ऐसा ही कुछ लगता है, क्यों फिर जन्म लेतें है प्रश्न में।
पटाक्षेप कर देतें हमारें प्रश्नों का, हर पल हमारा मन ओत प्रात्sा रहे तुझसे।


- डॉ.संतोष सिंह