VIEW HYMN

Hymn No. 422 | Date: 15-Oct-1998
Text Size
चुमं लेना चाहता हूँ, झूमकें तेरे चरणों को।
चुमं लेना चाहता हूँ, झूमकें तेरे चरणों को।
ढुंड लेना चाहता हूँ, इस जग के कोनें – कोनें में तुझको ।
रोनें की आदत बहुत है हमें, अब रोना चाहूँ तेरे लिये ।
प्यार तो कई बार कईयों से किया, अब बस तुझसे करना चाहूँ ।
घुट – घुट के मरनें से अच्छा है, इस बार तेरे लिये मर जाये ।
तडपू मैं तेरे लिये इतना, तेरा दिल भी घायल हो जाये ।
मरज जो लगा है तेरा, हर दवा से बडता चला जाये ।
विष भी अमृत बन जाता है अगर मिले तेरे हाथों से ।
गम में लेतें है नाम तेरा, हमें दे दें दुनिया भरकें गम तू ।
जान निकलती है तो निकल जाने दें, फनांह होना चाहता हूँ तूझपे ।


- डॉ.संतोष सिंह