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Hymn No. 426 | Date: 18-Oct-1998
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झुदा रह सकता हूँ एक बार को मैं तुझसे पर दिल को चैन ना तेरे बिना ।
झुदा रह सकता हूँ एक बार को मैं तुझसे पर दिल को चैन ना तेरे बिना ।
जोर चलता है मेरी मुझपे, मेरा दिल मुझसे बगावत पे उतर है जाता ।
मैं रमता हूँ कहीं और, दिल को गाहे – बगाहें याद सताती रहती है तेरी ।
इस दुनिया के कीसी कोनें में चला जाऊँ, पर दिल तुझको ना है भूला पाता।
अपने मन की करनें पे, दिल ही दिल में रोता हूँ बच्चों की तरह।
कीतनी बार झांसा दिया मन नें, तेरी और बढते हुये दिल को उलझा दिया।
इस तन – मन की बेड़ीयों से हो मुक्त, दिल नाचना चाहता है तेरे गीतों पे ।
इच्छा मन में अपने, कर्म तन करें, सजा मिलती है इस नादान दिल को ।
यें कैसा न्याय है, उन्मुक्त होके भटकतें है हम, अन्याय हर पल दिल से करतें ।
बेडियां डाल देते है दिल के कदमों में, फिर भी सिसकता है हर पल वो तेरे लिये ।
- डॉ.संतोष सिंह
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