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Hymn No. 430 | Date: 20-Oct-1998
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कैसें प्रभु में सीखुंगा जीना, जीतें हुये श्वास दर श्वास पे लेना चाहता हूँ नाम तेरा।
कैसें प्रभु में सीखुंगा जीना, जीतें हुये श्वास दर श्वास पे लेना चाहता हूँ नाम तेरा।

मेरा मन तो चलता है तेरे दर की डगर पे, पता नहीं चलता कब मार्ग से च्यूत हो जाता हूँ मैं ।

मेरा वश रहता ना है मुझपे, क्यों हो जाता हूँ क्रोधीत में ।

सब कुछ साध्य है तो, साध क्यों नहीं पाता मैं अपने तन – मन को ।

दिल का तू अच्छा लगता है, बहुतेक वो तुझमें रमता है ।

उसे ना है जमता कूछ तेरे बिना, तेरे अनुसार चलनें की कोशीश है करता ।

सताता कौन कीसे है, हम तो सिर्फ प्यार की बात है तुझसे करते ।

क्यों लड बैठते है अपने और परायों से, यें कैसा व्यवहार है संसार का।

दोष मैं कीसी ना हूँ देता, निर्दोष जीवन जीना चाहता हूँ मैं जीना ।


- डॉ.संतोष सिंह