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Hymn No. 435 | Date: 22-Oct-1998
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मन को जोड लें तू दिल से, तडपता है जिसके लिये हिलमिल जायेगा उससे ।
मन को जोड लें तू दिल से, तडपता है जिसके लिये हिलमिल जायेगा उससे ।
दे दें बुध्दि का सहारा तू मन को लडखडातें हुये कदम सम्भल जायेगे तेरे ।
इन सबसे अच्छा है सौंप दें तू अपने आपको उसकें हाथों में, जूदा ना कर सकेगा कोई तूझे उससे।
मरनें – जीनें, आशा – निराशा हर पहलूं से उबरकें तू उसका बन जायेगा।
उठें हुये कदम ना रूकेंगे कभी, तू उसकी ओर खूद ब खूद बनकें उसका बडता चला जायेगा।
तब भी मन में उठेंगे कई सवाल, दिल में हर इक् का जवाब मिलता चला जायेगा।
रहेगा तन तेरा कीतना भी दूर उससे, दिल से जन्में हुये हर स्वर पे मन तेरा झुमेंगा ।
बेसुध सा तू डूबा रहेगा उसमें, तन के बंधन को भूल तू नांचा करेंगा बनकें उसका।
तेरे दीवानेपन को देख वो दोडा चला आयेंगा, हर कन् में अपना स्वरूप दीखलायेंगा ।
भीड़ होगी तूझे भला – बुरा कहनें की, इन सबसे परें तू खोया रहेगा हर पल उसमें।
- डॉ.संतोष सिंह
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