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Hymn No. 438 | Date: 24-Oct-1998
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दया ही दया है तेरी हमपे, जो खाक था जीवन हमारा अमृत से भर गया ।
दया ही दया है तेरी हमपे, जो खाक था जीवन हमारा अमृत से भर गया ।
तेरा संग पाते ही मुरझायें हुये जीवन में नवजीवन का संचार हुआ।
कहनें को कुछ ना रखा है, इतनें गये बीतें थे, अपने आप में जीते थे ।
जो हाथ तूने फिराया सर पे, आमूलचुल मैं का मैं जीवन बदल गया।
व्यंजना पड़े प्राण तेरे लिये, मौका बिन गवायें पल भर में लुटायेंगे तूझपे ।
तेरी इनायत भरी निगाह के लिये, जीवन भरकी कमाई कर देंगे न्योछावर ।
मैं बेकार बदहाल कुहासा से भरा दिल मेरा, अंदर से बाहर काला ही काला था।
शरमायें देख देखकें मुझे कालीख भी, अमृत भरी निगाह तेरी पड़ते ही सब कूछ घूल गया।
भहुत कुछ बाकी है करने को, करते हुये तेरे धरम से भटकनें ना देना ।
दिल में गुजती रहे आवाज तेरी सदैव उसके अनुसार मैं यें जीवन जीता रहूँ ।
हर क्षण मेरा हो तेरा, तू जो करवायें बिन हिचक करता रहूँ ।
कोई भी ख्याल ना हो, मन मंदिर में तेरी छवी दिल में सदा शमायीं रहे ।


- डॉ.संतोष सिंह