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Hymn No. 439 | Date: 25-Oct-1998
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भटकना ना तू प्रभू मार्ग से, नहीं तो अटक जाओगें ।
भटकना ना तू प्रभू मार्ग से, नहीं तो अटक जाओगें ।
एक बार जो तू अटका, तो लटक जायेगा, कई - कई जनमां के लिये ।
पसीजा है जो आज वो, फिर कब पसीजेगा वो खुद ना है जानता ।
दिया है स्थान तूझे जो अपने चरणों मे, स्थिर कर लें तू मन को उसमें ।
भटकनें के लिये चंचल मन का इक् पहलु है काफी।
मन को तटस्थ करना है तो दिल लगाना सीख जा उससे ।
बेकाबू मन तन को लें दौडता है विषय वासनाओं में ।
बुध्दि हार जात है मन के सामनें, तब कर्म खेलतें है तेरे संग ।
अर्पित कर दें जो कुछ तेरा कहलाता है, दिल मचलें तो उसकें लिये ।
समत्व में ढल जायेगा बिन् कुछ कीयें, तू उसके गोद में समां जायेगा सब करतें हुये ।


- डॉ.संतोष सिंह