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Hymn No. 440 | Date: 25-Oct-1998
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कैसा खेल खेलतें है हम, कभी दौडते है, तो कभी गिर पड़ते है ।
कैसा खेल खेलतें है हम, कभी दौडते है, तो कभी गिर पड़ते है ।
सब कूछ जानतें है, पर दिल ही दिल उसे मानतें नहीं, जीततें हुये सब कूछ हार जातें है।
मुस्कुराते – रोते हुये जीवन का हर पल बीतता हें जरूर, वर्तमान अतीत में बदलता देखते है हर पल।
नश्वरता का साथ कब तक पकड़े में रहेगे हम, शाश्वत का साक्षात्कार कब करेंगे हम।
सत्य पे पर्दा डालकें कब तक जीतें रहेगे, आँखो के आगे छाया है तो दिल बंद है तन के पिंजड़े में।
तोड़ना कब सीखेंगे इस तन – मन के दीवारों को, हर अगले को अपना बनाना ।
आज नहीं तो कल इन सबसे नाता जरूर था, जिनसें है उनका पराया हो जान जरूर है ।
अधी – गहरी सर्वत्र खायीं फैली है, बांधना सीखना चाहते है शरण में रहके तेरे ।
जीया है इस मानव तन में कई बार कीड़े – मकोड़े से गया बीता जीवन, इस पुराने खेल को दोहराना ना है अब।
जब तेरे शरण में आ गये है हम, तो पार लगाना तुझको है ।
हम तो खुश रहेगे तेरा साथ मिलनें पे, ढलतें ढलतें ढल जायेगे तेरे अनुरूप बनकें ।


- डॉ.संतोष सिंह