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Hymn No. 442 | Date: 26-Oct-1998
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परवाना बनकें फिरूं चारों ओर तेरे, खाक होना पड़ा तो हो जायेगे बनकें तेरे ।
परवाना बनकें फिरूं चारों ओर तेरे, खाक होना पड़ा तो हो जायेगे बनकें तेरे ।
इससे पहले कई बार खाकसार खाक में है मिला, मेरा मैं मिटा नहीं इससे दूर रहा मैं तूझे।
बनकें तेरा जिस दिन खाक में मैं मिलुंगा, आजादी होगी सच्ची मेरी ।
इस क्रम को दोहराया है असंख्यों असंख्य परवानें ने ।
मिटतें हुये हर इक् नें अपने मिटनें का जश्न मनाया है ।
सताया उनकों इस जग और खुद नें, तब भी हर पल वें मौज मनातें रहे।
बदल डाला अनेक परिभाषाओं को, अच्छे – बूरे बनकें उनपे संजदा किया उनका।
निगाहो से आनंद घन बरसातें रहे सदा, चूपके - चूपके हरतें चलें गये सबकें संताप को।
तिल – तिलकें हरेंक के कर्मों को भोगा अपने तनकें उपर, पर रहे आत्मनंद में मस्त
बाहर के आनंद से दूर रहके, जीवन के हर पलों को निरानंदमय होके बिताया।
- डॉ.संतोष सिंह
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मेरा कुछ नहीं अपना, जो कूछ पाया, तुझसे ही पाया है ।
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