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Hymn No. 443 | Date: 27-Oct-1998
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मेरा कुछ नहीं अपना, जो कूछ पाया, तुझसे ही पाया है ।
मेरा कुछ नहीं अपना, जो कूछ पाया, तुझसे ही पाया है ।
जो मिला है, उसकें मोह में ना बंधना है मुझे ।
सरकता है संसार सारा, हर रिश्ता – नाता बदलता है ।
बदलता रहता हूँ जाती और धर्म, देश – काल बदलते है ।
धरती - चाँद, तारें पल – पल बदलतें रहतें है ।
रूका ना कोई, ना हीं बदलनें से अपने को रोक सका कोई ।
जीवन में बदलाव, जीवन के बाद बदलाव चलता रहता है ।
लोक हो या परलोक, सबकुछ बदलता रहता हें ।
बदलनें पे वश कीसीका ना है, बदलना नियती है सबकी ।
बदलाव के आगें हर नियम टूटकें नियमों का जन्म होता है ।
इन सबसे छोड़े थें कल वहीं वहीं उसे पाना है ।
जो शरण लिया उसकें चरणें में बदल जाता है ।
अनुरूप सद्गुरू कें सारा जग बदलता है पल भर में ।
अनुकूल हो या प्रतिकूल सद्गुरू हर परिस्थिती में रहता है सहज ।
ज्वार – भाटें आतें होगे उपर – उपर, अंतर में निश्चिंत रहता है वो ।
उसकी निश्चितता देखकें प्रभु कभी खीज के लेतें है परीक्षा अनेक ।
मुस्कूराता हुआ पार कर जाता है, कई जनमों के उतार - चढाव को ।
उसकी इस अदा पे प्रभु भी जातें हें रीझ ।
बदलना पड़ता है प्रभु को सद्गुरू के अनुरूप ।
प्यार हो या मस्ती चलतें है दोनों एक दूजे का स्वरूप धरकें ।


- डॉ.संतोष सिंह