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Hymn No. 444 | Date: 27-Oct-1998
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सबसे बड़ी अमानत मिल गयीं है मुझको, मेरे सारे जन्मों का धन मिल गया ।
सबसे बड़ी अमानत मिल गयीं है मुझको, मेरे सारे जन्मों का धन मिल गया ।
सौंप सकता नहीं उसे कीसीको, हर निगाह से बचाकें रखुंगा दिल के पिंजरे में ।
कौन कहता है, जीवन के कीसी क्षण रहता हूँ अकेला, सुन लो संग रहता है मेरे त्रिपुरारी।
ना है डर मुझे कीसीका, अकूत अखंड है संपदा मेरी जो हर पल बडती रहती है ।
गंवानें का ना है डर, लुटानें से बडती जाये, जिसनें संजोया खुशीयाँ मनायें उसके संग ।
यह धन है अनोखा, अनायास या पता नहीं कीस कृपा से लग गया हाथों में मेरे ।
सच – सच कहुँ मैंने कुछ कमाया नहीं जो पाया उसकी कृपा से ।
हाँ इतराता जरूर हूँ उसपे मैं, अपनीं खुशीयों को दबा नहीं पाता हूँ मैं ।
इस भोगी की कीस्मत बदल गयीं, देवराज भी आज करते है ईर्ष्या मुझसे ।
कहना ना कीसी से अमृत से बढकें, सद्गुरू नामक अमुल्य धन मुझे मिल गया ।


- डॉ.संतोष सिंह