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Hymn No. 445 | Date: 28-Oct-1998
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रीझाना चाहता हूँ में तूझे अपना बनानें के लिये।
रीझाना चाहता हूँ में तूझे अपना बनानें के लिये।
या खुद रीझ जान चाहता हूँ तूझपे तेरा बननें के लिये,
बांट लुंगा मैं सब कुछ सबसे, तूझे ना बाँट सकता मैं कीसीसे ।
हर हालत से उबर जाऊँगा तेरा नाराज होना ना झेल पाऊँगा ।
कीसी बात पे ना हौ नाज मुझें, हम तो नाज करते है तूझपे ।
हक जताता हूँ मैं बहुत तूझपे, कौही के काबील नहीं मैं ।
जो तू है बताता वहीं तो हूँ सुनाता, कहाँ कुछ है मेरा ।
स्वार्थी मेरा इतना है कूछ भी करकें रहना चाहूँ करीब तेरे ।
तेरे सोहबत में रहके तेरे लायक बनना हूँ चाहता ।
अच्छें – भलें लोगों की दुनिया में कहाँ से आ गया मैं ।
तेरी कृपा होगी जो तू चाहेंगा वो हम कर दिखायेंगे ।


- डॉ.संतोष सिंह