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Hymn No. 446 | Date: 28-Oct-1998
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कुछ, कुछ भी नहीं जानतें हम तेरे नाम के सिवाय ।
कुछ, कुछ भी नहीं जानतें हम तेरे नाम के सिवाय ।
तेरा दर्शन किया कई बार, दिल को संतोष ना हुआ अब तक ।
प्रसाद तूने दिया कई बार हमें, सच्चें दिल से ग्रहण ना किया ।
इच्छाओं औंर वासनाओं की भूख मिटी ना है अब तक हमारी ।
सत्संग तेरा करते है, तन – मन को डूबो ना पाते है हम ।
असुरक्षा की भावना व्याप्त रहती है हमारें दिलों में हर पल ।
जतन तेरे स्वरूप का जब तक ना कर पाया दिल में ।
हर क्षण मनन् करतें है अपने दूनियादारी के चिंताओं का।
ज्ञान की बात करतें अधातें नहीं, अब तक चख ना पाया ज्ञान रस को ।
अपनीं मुरखता भरी, हरकतों को प्रेम का नाम दें देतें है ।
कमीयें के सागर है हम प्रभु, एक ढुंडो हजारों हजार मिलेंगी
मैं पार जाने की हसरत ना हूँ रखता डूब जाये दिल मेरा तुझमें ।


- डॉ.संतोष सिंह