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Hymn No. 447 | Date: 29-Oct-1998
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रह रहके दगा दें जाता हूँ खुदको, मैं चलता हूँ तेरी ओर कहीं और पहुंच जाता हूँ ।
रह रहके दगा दें जाता हूँ खुदको, मैं चलता हूँ तेरी ओर कहीं और पहुंच जाता हूँ ।
अपने आप से पार नहीं पाता हूँ, इस संसार के चक्रव्युह को तोड़ कैसे पाऊंगा।
तूने दिया है तीन अमोद्य शस्त्र, मन, बुध्दि और दिल उनकी मदद कैसे लेना है वो भी हमें नहीं आता।
सतत् है हमपे तेरी कृपा, तूझपे विश्वास है अमिट हमारा, पार हो जायेगे आया की वैतरणी को।
चिंतित ना हूँ मैं अपने लिये, मचलता हूँ कहीं भीतर से तेरा सत्संग पानें के लिये।
मन जो मेरा बेकाबू है उसे तू बेकाबू रहनें दें, कर तू कृपा इतनी मेरे मन के मुख को मोड दें तेरी ओर।
बुध्दि का सहारा हो बस इतना जहाँ नजरों से तेरा दर्शन ना हो, वहाँ दर्शन कर लूँ बुध्दि के सहारें।
ज्ञान की खाइयों में ना है गिरना मुझे, मैं तो चाहूँ दिल की आवाज सुनना जो पुकारें सदा तूझे ।
मैं मेरा मन, बुध्दि डूब जाये उसमें सदा के लिये, अपने – अपने अस्तित्व को त्याग कें दिल की तरंग बन कें पहुचें तेरे दर की ओर।
- डॉ.संतोष सिंह
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