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Hymn No. 448 | Date: 29-Oct-1998
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झोकें ना तू मुझे मेरे कर्मों के संसार में, बन जाऊँ मैं तेरे जग का इक् अभिन्न अंग
झोकें ना तू मुझे मेरे कर्मों के संसार में, बन जाऊँ मैं तेरे जग का इक् अभिन्न अंग
मुस्कूराता रहूँ मैं अकेले तेरे यादों के संग, दिल के झंकारों के संग लयबध्द हो गीत गाऊँ तेरा
जतानें औंर बतानें की चिंता से मुक्त, तेरे संसार में मैं फिरता रहूँ या स्थिर रहूँ ।
फिकर ना हो मुझे अपनीं और कीसीकी, जाने बगैर दिल मेरा पुकारें तूझें बार – बार।
अवस्था हो तन की, मिट जाये अस्तित्व मन का, fिस की धुनों पे नाचा करेंगे संग तेरे।
शुन्य में ताकतें हुये, पागल बनकें फिरता रहूँ लोगों के बीच तेरे ख्यालें में डूबें हुये ।
देखुं मैं सबको देखते हुये तुझको, जुडना कीसी से हो जुड़ा रहूँ मैं बस तूझसें ।
पहचान कोई मुझें ना है बनानी, प्रभु हम अपनी दीवानगी मैं डूबें हूयें बडते रहे तेरे और
कोई भी भाव आयें फर्क ना पड़े, मैं बस तेरे भावों में डूबकें तेरी तुझमें निमग्न रहूं
हर पल उत्सव मनाऊँ दुख सुख से गुजरतें हुये मैं अपने प्रभु के संग ।


- डॉ.संतोष सिंह