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Hymn No. 451 | Date: 31-Oct-1998
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जगत पिता तेरी वंदना करता हूँ कई कई बार, तेरी कृपा है जो तूने दिया है हमें बहुत कुछ ।
जगत पिता तेरी वंदना करता हूँ कई कई बार, तेरी कृपा है जो तूने दिया है हमें बहुत कुछ ।

सरलता से तू हमारें कार्य को परिणित करता है सफलता में ।

किंचित मात्र आभास ना होने देता है चमत्कार का।

हमारें संग घुलमिल के सहजता से तू मानव जीवन है जीता,

प्यार से अपने तू हमारें गये बीतें जीवन को है बदल देता।

शब्दों की है सीमा, तेरी कथा कहनें के लिये बुध्दि मेरी तूच्छ है, ब्रह्माण्ड के नायक के सामनें, रेत के एक क्षुद्र कन की क्या बिसात ।

जन्म के साथ पाया तेरा संग, इससे बड़ी दया क्या होगी,

अरबों – करोडाs फिरते है मुझ जैसे, इस मुरख को पास बुलाया तूने ।

कहीं कुछ भी नहीं है मेरा, सब कुछ तो है तेरा,

हसरत बस एक है तेरी क्या रहे ता धूल बन जाये तेरे चरणों की ।


- डॉ.संतोष सिंह