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Hymn No. 461 | Date: 07-Nov-1998
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सम्मुख बैठें है हम तेरे, और तरस रहे तेरे लिये।
सम्मुख बैठें है हम तेरे, और तरस रहे तेरे लिये।
सुध हमारीं जातीं रहती है, होती है जब मुलाखात तूझसें ।
स्व पर से हमारा नियंत्रण ना जाने कब छूट जाता है ।
तेरी निगाहें से निगाह मिलतें ही हर भेद मिट जाता है ।
कहीं कुछ भी नजर नहीं आता है तेरे सिवाय ।
ना याद आती है, ना ही ख्याल रहता है, जब हमारें पास तू होता है ।
तन – मन की हर पीडा को भूलाकें अनोखें आनंद में विचरतें है ।
न जाने क्याँ- क्याँ होता है हर बंधन घूल मिल जाता है ।
दिल गुनगुनातें हुये मचलता है तूझे गीत सुनानें को ।
भावविभोर होके आँखें नम हो जाती है तेरे चरणों के स्पर्श कें लिये ।
हर मैंल मन का बह जाता है तुझसे मेल करनें के लिये ।
अलग होतें ही तुझसे, दुनिया जेल लगनें लगती है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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बन जाने दें प्रभु मुझे बांवरा, विचरता फिरूं तेरे जग में नाम लेतें तेरा।
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आज तक तेरे साथ रहके तेरी हर बात सुनतें हुये अनसुना करतें रहे तूझे ।
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