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Hymn No. 465 | Date: 08-Nov-1998
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सच्चाई हम सबकीं बदलती रहती है समय के संग – संग।
सच्चाई हम सबकीं बदलती रहती है समय के संग – संग।
माया के आवरण से ढंका हुआ है सच्चाई का स्वरूप ।
अज्ञान भरें नजरो से खोजते है जगत में व्याप्त सच को ।
मन होगा जैसा वैसा देखेंगे सत्य के अलग अलग स्वरुपों को ।
सदा सतय ही परम् सत्य है, यह अनवरत एक जैसा रहता है ।
प्रेम भरी निगाहो से देखनें पे अपने साक्षात स्वरूप में है दिखता ।
इसकी कीमत कोई ना है चुका सकता, भौतीक सतय से परें है ये सत्य।
सद्गुरू की कृपा से भान होता है इसका, रास इक् बार हद्रय को आ गया तो फिर कभी साथ ना है छुटता ।
- डॉ.संतोष सिंह
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सद्गुरू देव बहा लें जा तू हमें अपने प्यार में बहतें बहतें मिट जायेगा अस्तित्व हमारा ।
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खाब देखते रहतें है अनेक हम, सच्चाई से रूबरू होनें पे घबरा जाते है।
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