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Hymn No. 466 | Date: 09-Nov-1998
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खाब देखते रहतें है अनेक हम, सच्चाई से रूबरू होनें पे घबरा जाते है।
खाब देखते रहतें है अनेक हम, सच्चाई से रूबरू होनें पे घबरा जाते है।
कल्पनाओं में खोयें रहतें है, बच्चा – खुच्चा समय में गप्पें – बाजी करते है ।
मुँह मोडके जीतें है वर्तमान में, भविष्य की सुखद कल्पनाओं में खोयें रहतें है ।
सबक नहीं सीखतें भूत से, विशद् घटनाओं को अनुकूल अपने जोडतें है ।
रूबरू होना पड़ेगा शाश्वत सत्य से, मन में उठें हुये तरंगों के संग जीना पड़ेगा।
तब तक आवाज दबातें रहेगे दिल की, आज नहीं तो कल सुननी पड़ेगी।
थकता है तब – मन तो थकनें दें, दिल का थकना तो जीवन का अंत होता है ।
संसार के जंजाल के संग होगा ताल – मेल बिठाना, प्रभु के चरणों में मन लगाना ।
गलत कुछ ना है, मन के भाव हो अच्छें, शाश्वत् बैर कीसी से ना होता है ।
बदलता है सब कूछ अपने आप, अगर प्रभु के शरण में हम रहतें है ।


- डॉ.संतोष सिंह