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Hymn No. 468 | Date: 10-Nov-1998
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मन की तीव्रता में सब कूछ बह जाता है, पछतानें से कूछ ना होता।
मन की तीव्रता में सब कूछ बह जाता है, पछतानें से कूछ ना होता।
संयम सबसे बड़ी अमानत है, शरण में कीसीके रहना कहनें में भेद बहुत है ।
बुध्दि जब मन के संग भोगों के पीछे है दौडती, हाथ आया हुआ भी गवां बैठतें है।
लोभ बस धन का ना होता है, अपने जरूरत से ज्यादा पानें की चाहत लोभ है ।
जानते है हम सब कुछ फिर भी फंसते है, काम के दलदलों में ।
भक्ति में कमीं रह जातीं है तो जन्म लेतें है मन में तरह – तरह के विकार।
सच्ची साधना से मिलती है शक्ति, जिसे संयम से आमसात् करना पड़ता है ।
प्रेम मूल है भक्ति का जो हर भेंद मिटाकें प्रभुमय जगत का दर्शन कराती है।
नम्रता विशेषता को ढंक के साधारण जनों के संग साधारण तरीकें से रहके प्रभुमय होना पड़ता है।
कुछ भी करने से पहलें सद्गुरू की आज्ञा लेनी पड़ती है हर भाव से दूर रहके उसका बनना पड़ता है।


- डॉ.संतोष सिंह