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Hymn No. 469 | Date: 10-Nov-1998
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डूबतें उतारतें है हम तन – मन के बीच फसकें तूझे पुकार लगातें है।
डूबतें उतारतें है हम तन – मन के बीच फसकें तूझे पुकार लगातें है।
अपनीं जरूरतों का रोना रोकें तूझे रोज फसातें है ।
कहतें तो हम तेरे भक्त है, पर अपनी इच्छाओं के गुलाम है ।
भक्ति की आड लेकें प्रयास करतें है औरों की आँखों में धूल झोकानें का।
स्वार्थ से उपर उठकें देख नहीं पातें, तूलना में जीवन बितातें है हम ।
उपदेश बहुत देतें है औरों को, खुद का जीवन उसके अनुरूप ढाल नहीं पाता।
हरेकं में मीन – मेखं निकालते है, अपने कीयें पे इतरातें फिरतें है ।
कारण कई गीनातें है खुदकों सही साबीत करनें के लिये।
हर कर्म करनें से पहलें फल की आश लगा बैठते है ।
आधा – अधुरा प्रयास करकें, तूझपे जिम्मेदारी डाल देते है ।
बात बेबात पे मन की भडास क्रोध रूप में नि ओरों पे निकालते है।
इतना सब कूछ करकें प्रभू तेरा संग पानें की आश रखतें है हम ।
- डॉ.संतोष सिंह
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मन की तीव्रता में सब कूछ बह जाता है, पछतानें से कूछ ना होता।
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फेर दें प्रभु मेरे मन को, अशक्त रहे हर पल तेरे लिये ।
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