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Hymn No. 470 | Date: 11-Nov-1998
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फेर दें प्रभु मेरे मन को, अशक्त रहे हर पल तेरे लिये ।
फेर दें प्रभु मेरे मन को, अशक्त रहे हर पल तेरे लिये ।
बूध्दि सशक्त रहे मेरी इतनी, सद्मार्ग से च्यूत कर ना सकें कोई मुझे ।
प्रेम मेरा निर्झर बहता रहे, डूबुं में और डूबोता चसला जाऊँ सबको ।
मुझे ना रहे कोई खबर तेरे संग मेरे जीवन का बीतें हर पल ।
कोई आहत कर ना सकें मेरे दिल और मन को इतना खो जाऊँ मैं तुझमें ।
तन कट् – कट् के गिरता है तो गिरनें दें, दोष कीसीको ना दूंगा बेसुध में तुझमें रहूंगा।
सवालें का जन्म होता है शंकाओं के फेरें में, प्रेम में कोई सवाल ना होता है ।
मेंरी दुनिया सिमट गयी तुझमें, तेरे सिवाय कूछ नजर नहीं आता।
लानत कोई बरसाता है तो बरसायें हमपे, हम तेरे गुण गातें रहेगे।
दुनिया भर का जहर पीना पड़ा पी जायेगे, तेरी झूठंन समझकें।
तुझसे अलग कोई ना कर पायेंगा, जो जुड़ा होता है उसे अलग करना होता है।
- डॉ.संतोष सिंह
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डूबतें उतारतें है हम तन – मन के बीच फसकें तूझे पुकार लगातें है।
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तेरी उंगली पकड ली हमनें, तो मालुम ना है करना कहाँ है जान ।
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