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Hymn No. 471 | Date: 11-Nov-1998
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तेरी उंगली पकड ली हमनें, तो मालुम ना है करना कहाँ है जान ।
तेरी उंगली पकड ली हमनें, तो मालुम ना है करना कहाँ है जान ।
हमारें लिये हर वो राह है पहचाना, जहाँ से तू लें जाने वाला है ।
जब प्रेम कर लीया तुझसे, फिर क्यों कीस बात से है घबराना ।
न्योच्छांवर होना पड़ा प्रेम पे, बिन हिचक हो जायेगे प्रेम पे अपने न्योंछावर।
मौका ऐसा बार – बार नहीं आता, जो आज चुकें फिर न जाने कीतनें जनमों के बाद आयेंगे।
तेरे संग चलनें के उत्साह में मिट गया है मन का हर डर ।
जुर्रत कर बैठता है दिल मेरा मनकें भावों में बहपे तेरे अंग लग जाने को ।
तेरे प्रेम में हमें क्या हो जाता है हर शर्म त्याग कें तेरे दामन में लिपट जाने को मन है करता।
दिल की जुर्रत दिनों ब दिन बडती जाती है सरेआम तुझसे जाने को कहता है ।
सजा की परवाह ना हम है करते, तूझपे कुर्बान कर चूकां हूँ हम अपने को।


- डॉ.संतोष सिंह