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Hymn No. 472 | Date: 12-Nov-1998
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तर गये हम गुरूदेंव तेरे चरणों में आकें, खाक थे खाक में मिल जातें ।
तर गये हम गुरूदेंव तेरे चरणों में आकें, खाक थे खाक में मिल जातें ।
तेंरी कृपा से नीरसमय जीवन आनंदमय हो के गया हमारें जीनें का अर्थ बदल गया।
बद् से बद्तर जीवन जीतें थें हम, हर पल जागतें हुये सोतें थे।
हाथ जो फेरां तूने सर पे, अंतर मेरा चीत्कार करतें हुये जाग उठा।
इस क्षुद्र के पास कुछ ना ऐंसा है खुद के सिवाय, जो अर्पित कर सकें तेरे श्री चरणों में ।
जो कुछ भी पाया तेरी कृपा से, तूझे अर्पित करते हुये किंचित मात्र संकोच ना होगा मुझे।
अधिकार तो मेरा कुछ पे ना है, देता है कुद तो दें तू गुरू भक्ति मुझें ।
तू जहाँ भी जिस अवस्था में रखें तेरे नाम गूण गाता रहूँ मैं ।
बहुत मजा किया, बहुत सजा पायीं; अब तेरी रजा चाहता हूँ तुझमें खो जाने की।
तूझ में खोना नहीं चाहता जो आज तू मिल गया, न जाने फिर कीस जनम में मिलेगा।
- डॉ.संतोष सिंह
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