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Hymn No. 473 | Date: 12-Nov-1998
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सद्गुरू देव माया की तंद्रा छायी हुयीं हें हमपे, बड़ी गहरी कई - कई जनमों से ।
सद्गुरू देव माया की तंद्रा छायी हुयीं हें हमपे, बड़ी गहरी कई - कई जनमों से ।

विवशता में जके हुये है हम, उठना चाहते है उठ – उठकें सो जातें है ।

ताकत ना है हममें इतनी तोड़ सकें इस मायाजाल को, जिसमें फंसे है कई युगों से।

भोग – भोगा है कई जनमों से, तन – मन के द्वारा कीयें गये कर्मों के वजह से ।

हर जनमों में खेल खेला व्रूर नियती ने दोष में कीसीको ना हूँ देना चाहता ।

तेरा संग मिल गया तेरी कृपा से, हर चक्रव्यूह को तोड़ते हूयें निकल जायेगे हम।

अब तक निपट अकेले थें हम, नजरों के सामनें तम का गहन अंधकार छाया हुआ था।

दिल में जगी है प्रेम की कीरन,उसकें सहारें जगायेंगे ज्ञान के दीप को।

तेरे बतायें हुये सद्मार्ग पे बड जायेगे, तेरे गीतों को गुनगुनातें हुये।

वश मैं होगे तेरे प्रेम के हम, झूमतें हुये चलेंगे बिना कीसी डर के मंजील की ओर।


- डॉ.संतोष सिंह