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Hymn No. 474 | Date: 12-Nov-1998
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मुझसे ना कोई छींन सकता है मेरे प्रभु को, दया है उसकी जो याद आता है वो हर पल।
मुझसे ना कोई छींन सकता है मेरे प्रभु को, दया है उसकी जो याद आता है वो हर पल।

गुनगुना होते है मन ही मन उसका नाम अपने दिनचर्या के दौरान हो जातें है अपने पे हैरान हम।

खांब ना दीखाता है वो, हकीकत में जीना सीखाता सदा, उसकी सदा पे फिदा हो जाता है हम।

बिगड़ी हुयीं बनाता है, रूठें हुये को मनायें, हेर फेर जाता है, शांत सरल रहके इस जग में।

कोई अंदाज ना लगा पाता, इतना अथाह गहरा है वो, जिसनें लीया शरण उसका उसे दिया सब कूछ

चमत्कार से करें परहेज वो, जिसनें लीया सहारा उसका हौलें हौलें जीवन बदल देता है उसका।

अपना प्रेम का भुखा है वो जिसने जो अर्पित किया उसे बिना कीसी हिचक के ग्रहण कर लेता है।

त्यागी उसस कोई नहीं दूजां, हमारें क्रूर कर्मों के फल को खूद भागता, अपने सुख को बांटता हम में।

उसे परवाह नहीं कीसीकी, राजा हो या रंक सब आकें दरबार में उसके सजदा करतें ।

प्यार तो वो सब की है करता, छोटा बडा हो या बडा कोई मायनें ना रखता उसकें लिये।


- डॉ.संतोष सिंह