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Hymn No. 477 | Date: 14-Nov-1998
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अपनापन इस मन में इतना भर गया है, हर पल स्वार्थ से घिरा रहता हूँ ।
अपनापन इस मन में इतना भर गया है, हर पल स्वार्थ से घिरा रहता हूँ ।
कहाँ हम त्यागनें निकलें थें, सुमार्ग के राहो पे चलतें - चलतें भटक गया हूँ मैं ।
पाया हुआ खोता जा रहा हूँ, आनंदमय जीवन हाथ से खिसकता जा रहा है।
दोराहें पे खडा हूँ मैं, एक राह पे दिल जाने को मचलें, र्निद्वंद अपने मस्ती में रहनें को कहता है।
दूर राह पे मेरी कमजोरीयाँ मन का हाथ पकड के इच्छाओं के संग उडना चाहती है।
यहाँ – वहाँ भटका, कई बार पाला बदला जीत हार का खेंल खेंला कर्मों ने ।
कभी तडप उठता हूँ कही भीतर से वंदन करता हूँ तेरे लिये ।
फैलायें हुये जीवन को सीकोड लेना चाहता हूँ, अपनी सारी प्रवृत्तियों का मुख मोड देना।
अपने भीतर छुपे हुये निर्मल प्रेम की धारा में बहना चाहता हूँ सद्गुरू की ओर।
मिटना पड़ा तो तैयार हूँ में मिटनें के लिये, उसकें सान्निध्य में जीवन गुजारना चाहता हूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह