My Divine
Home
Bhajan
Quotes
About Author
Contact Us
Login
|
Sign Up
ENGLISH
HINDI
GUJARATI
My Divine Blessing
VIEW HYMN
Hymn No. 477 | Date: 14-Nov-1998
Text Size
अपनापन इस मन में इतना भर गया है, हर पल स्वार्थ से घिरा रहता हूँ ।
अपनापन इस मन में इतना भर गया है, हर पल स्वार्थ से घिरा रहता हूँ ।
कहाँ हम त्यागनें निकलें थें, सुमार्ग के राहो पे चलतें - चलतें भटक गया हूँ मैं ।
पाया हुआ खोता जा रहा हूँ, आनंदमय जीवन हाथ से खिसकता जा रहा है।
दोराहें पे खडा हूँ मैं, एक राह पे दिल जाने को मचलें, र्निद्वंद अपने मस्ती में रहनें को कहता है।
दूर राह पे मेरी कमजोरीयाँ मन का हाथ पकड के इच्छाओं के संग उडना चाहती है।
यहाँ – वहाँ भटका, कई बार पाला बदला जीत हार का खेंल खेंला कर्मों ने ।
कभी तडप उठता हूँ कही भीतर से वंदन करता हूँ तेरे लिये ।
फैलायें हुये जीवन को सीकोड लेना चाहता हूँ, अपनी सारी प्रवृत्तियों का मुख मोड देना।
अपने भीतर छुपे हुये निर्मल प्रेम की धारा में बहना चाहता हूँ सद्गुरू की ओर।
मिटना पड़ा तो तैयार हूँ में मिटनें के लिये, उसकें सान्निध्य में जीवन गुजारना चाहता हूँ ।
- डॉ.संतोष सिंह
Previous
होश में ना रहना हूँ चाहता, छाया रहे मुझपे आलम तेंरा । जो होना होगा देखा जायेगा, परवाह ना है मुणे कीसीकी । कीस बात की फिकर करूं मैं, जो हो रहा है तेरी मर्जी से ।
Next
दिल का हॉल सुनातें है, तूझे रोज ही, तेरी ना सुनतें है कभी ।
*
*