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Hymn No. 478 | Date: 15-Nov-1998
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दिल का हॉल सुनातें है, तूझे रोज ही, तेरी ना सुनतें है कभी ।
दिल का हॉल सुनातें है, तूझे रोज ही, तेरी ना सुनतें है कभी ।
गीत तेरा गातें है तेरे सम्मुख बैठकें, वह जाने ना दे है खुदको ।
खुद का नियंत्रण तूझे सौंपते है, पर खुदही नियंत्रण रखते है खुदपे ।
अजीव दासतां है हमारी, उकताते नहीं रोज – रोज दोहरातें है ।
तूझे पानें के लिये चलते है, विषय संसार में खो जाते है ।
तेरे साथ रहके हमारा यें हाल है, तेरे न रहनें पे न जाने क्या हाल होता।
सारी हदें तोड़के पागल बन जान चाहता हूँ तेरे प्रेम में ।
छुडायें ना छुटता है अपने परायें का मोह, आदत – स्वभाव बनता जा रहा है,
प्रभु हम तूझे पानें ना निकलें है, खोना चाहते है अपने आपकों तुझमें ।
संसार और तन की सारी बंदिशे तोड़के मिट जान चाहता है तुझमें ।
- डॉ.संतोष सिंह
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अपनापन इस मन में इतना भर गया है, हर पल स्वार्थ से घिरा रहता हूँ ।
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प्यार का जाम पीतें रहे प्रभु तेरा नाम लेतें रहे ।
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