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Hymn No. 482 | Date: 17-Nov-1998
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काका नाम के महासागर में कई - कई ब्रह्माण्ड समायें है ।
काका नाम के महासागर में कई - कई ब्रह्माण्ड समायें है ।
नाम अलग – अलग दें रखा है हमनें पर वो एक ही है ।
कीसी को महासागर लगें, तो कोई परम् पुकारे, कूछ नहीं तो खव्य नजर आयें।
जिस कीसी ने दिल के जिस भाव से देखा, उसे वहीं रूप नजर आया।
किंचित मात्र भेंद ना है उसमें, नजरों ने भेद कर डाला।
डगर अलग – अलग है हम सबकी, मंजिल तो एक है ।
राही है हम सभी, एक दूजें के आगे पीछे यात्रा करतें रहतें है।
जान है हमें एक जगह, पर भीड़का साथ ना होगा कीसीको कीसीका।
कर्मों से उपजें हुये फल को हमें हमारे उपर भोगना पड़ेगा है ।
शरण उसमें लेकें निस्पृह बनकें, इस महायात्रा को करनी पड़ेगी पूरी।
- डॉ.संतोष सिंह
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रूला लें तू मुझें जितना रूलाना है, दोष लगा देना तू हमारें करमों पे।
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बहुत कुछ जाना प्रभु कृपा से फिर भी कुछ ना जाना।
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