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Hymn No. 483 | Date: 17-Nov-1998
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बहुत कुछ जाना प्रभु कृपा से फिर भी कुछ ना जाना।
बहुत कुछ जाना प्रभु कृपा से फिर भी कुछ ना जाना।
बहुत कुछ का उत्तराधिकारी बना, जाते हुये कुछ काम ना आया।
जो कुछ उसका बनकें पाया, उसीनें सदा साथ निभाया ।
लुभाती है दुनिया बड़ी प्यारी लगती है, फंस जाता है मन उसमें ।
खुद को जकड लेतें है हम अपने आपको उसके जेल में ।
मौका देता है वो विचरनें का उसकें अनंत साम्राज्य में ।
अनंत शक्तियों से युक्त करकें हमें भेजता है इस धरा पे ।
रोतें गिडगिडातें बैर स्व से रखतें, बन जातें है क्षुद्र हम।
उसकीं बतायीं हुयीं पहचान को भुलाकें कर्मों के जाल में फंस जातें है ।
शरण लेना होगा हमें उसका, आज नहीं तो कल बनकें उसका।
- डॉ.संतोष सिंह
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