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Hymn No. 484 | Date: 17-Nov-1998
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पुंज – पुंजके पत्थर मन हो गया है पत्थर, सर झुकाया सदा पत्थरों के आगें ।
पुंज – पुंजके पत्थर मन हो गया है पत्थर, सर झुकाया सदा पत्थरों के आगें ।
हाड - मांस के प्रभु को पहचान न पाया दिल नें, अंतराविरोध में दिल की आवाज दबती चली गयी।
पुजा है हमनें सदा प्रभु के आगें कामनाओं को, चैतन्य है वो सदा से, मूरत में बदल डाला हमने।
मानकें न मानतें है उसे हम, दिल की आवाज ना सुनकें, मन के संग नांचते है।
जो शाश्वत है उसके लिये दर – दर भटकते है, अपने अंत में झांकतें ना कभी।
सहज भाव से प्रभु मिल जाता है तो मन ही मन अस्वीकार करतें है उसका।
जागृत का तिरस्कार करकें मृतको पूजतें है, वर्तमान में ना जीकें भूत – भविष्य को याद करते है।
आसक्ती तो रहती है भीतर जन्म से, तोड़ नहीं पातें इसे दृडनिश्चय बनकें ।
काल में पैदा होके काल में समा जाते है, सत्य से रूबरू नहीं होना चाहते ।
अंत तो होता है सबका चाहें या ना चाहें, बदलना है हम सबको आज नहीं तो कल।


- डॉ.संतोष सिंह