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Hymn No. 486 | Date: 18-Nov-1998
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बवंडर मचा रहता है हमारें मन में, तन चूपचाप सहता रहता है।
बवंडर मचा रहता है हमारें मन में, तन चूपचाप सहता रहता है।
दिल आँसू बहाता है याद करकें तूझे, मदद के लिये गुहार लगाता है।
इतनी गहरी नींद में सोयें हुये है हम, तेरे झिंझोड पे उठ – उठ सो जातें है।
फरियादों की माला गले में लिये हुये तेरे आगे पीछे फिरतें है हम।
त्यागना चाहते है बहुत कुछ, त्याग के तेरे पद्चिन्हों पे चलना चाहते है ।
कभीं बहुत कुछ है हमारें अंदर, तूझे स्वीकार नहीं कर पातें है भीतर से।
कूछ नहीं आता है हमें, ले देकें याद आती है जब तेरी गुहार लगातें है ।
विरह लंबी होती जान पड़ती है, जो कुद सीखाना है सीखा दें तू आज हमें ।
अवयस्क मैं हूँ, तन से बडा, पर मनकें कई पहलु अनहुये है हमारें ।
क्या करना, क्या न करना तू सीखां दे हमें प्यार भरे गीतों में गुथकें।


- डॉ.संतोष सिंह