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Hymn No. 491 | Date: 21-Nov-1998
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आगाह तूने कई बार किया हमें, जलती हुयी आगों से ना खेलनें के लिये।
आगाह तूने कई बार किया हमें, जलती हुयी आगों से ना खेलनें के लिये।
तन जलता है तो बल जाने दें, मन जल गया तो कोई दवा नहीं ।
प्यार का लेप तू लगाता जा, कोई आग तूझे कभी ना जला सकें।
जिनकों देख बडाs – बडाs के छक्कें जाते है टूट, वो काम कोई अदना सा है कर जाता।
गेसुं तो हम रोज ही बहाते है, भाव विभोर होके प्यार में उसके रोनें का कुछ और मना है।
सजा तो हमनें खुदको खुदसे दिया नाम उसका दें डाला।
मदद के लिये चिल्लातें है उससे, मदद मिलनें पे भूल जातें है उसे।
लाखें – करोडाsं कर्म करनें के बाद दोष – दामन पे लगा देतें है उसके ।
कई बार बहाया पश्चाताप के आँसू, हर बार दोहराया अपने आपको।
हर नई शुरूआत के बाद फिसल – फिसलकें वहीं गिरें जहाँ से की थी शुरूआत हमनें
हिम्मत ना हारूंगा मैं कभी, सच्चे दिल से आवाज दुंगा तूझे।
मुडके ना देखूंगा कभी पीछे, जो कदम उठें हें तेरी ओर तो बडतें जायेगे।
- डॉ.संतोष सिंह
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