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Hymn No. 493 | Date: 28-Nov-1998
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आखीर वो क्यों है जिसकें चलतें तूझें जानतें हुये जान ना पातें है हम ।
आखीर वो क्यों है जिसकें चलतें तूझें जानतें हुये जान ना पातें है हम ।
टकराना ना है हमें कीसी से, प्रेम करना चाहता हूँ सभी से।
काल कें वश में है जीवन हमारा, हर पल क्षय होता रहता है ।
मन में शंका है अनेक, जीन्हें दूर करना है तूझे प्रभू।
दिल लगातें है तुझसे, लगातें – लगातें लगा बैठते है कहीं ओर।
जल्दी मैं ना तुझसे हूँ कुछ चाहता, तेरे बतायें समय पे हूँ सब चाहता।
राहत ना मिलता है हमें कीसी से, तेरे नाम के सिवाय ।
जद्दोजहद् बडती जा रहीं है हमारे भीतर तेरे लिये ।
आगाह मैं कीसी को ना हूँ करता, समय रहतें खुद को आगाह कर लेंना हूँ चाहता।
इस जीवन का हर पल तेंरा नाम लेतें हुये बीतना हूँ चाहता।


- डॉ.संतोष सिंह