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Hymn No. 497 | Date: 28-Nov-1998
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आवाज दें रहा हूँ तूझे मन ही मन, पहुंचे या ना पहुंचे तू सुन रहा होगा जरूर।
आवाज दें रहा हूँ तूझे मन ही मन, पहुंचे या ना पहुंचे तू सुन रहा होगा जरूर।
काबील तो मैं नहीं, पर तेरे हद्रय की विशालता है जो शरण देता है चरणों में अपने ।
अपना बना ना सकता कीसी को, जब मैं तूझे अपना बना ना सका इस जीवन में ।
मौत के साथ सब कूछ छुट जाता है, शुरूआत होती है नयें सिरे से नयें जीवन की।
कीतनें पड़ाव आतें है जातें है मंजिल कोई जांन नहीं पाता, दोहराने का क्रम जारी रहता है।
सत्य से अंजान हम, अपने – अपने सत्य को शाश्वत सत्य समझनें की भूल कर बैठते है ।
देश – दुनिया में बंधकें तन के भीतर सिमट जातें है, मन की असीमीत शक्ति को पहचान नहीं पातें ।
प्रभु मौका देता है कई बार, अस्वीकार कर बैठते है घोघी धारणाओं के चक्कर में भौतिकता में जकडके।
वो अब भी हमारें बीच आता है कई लीलायें रचकें नयें – नयें दीखाता है हम स्वीकार कर नहीं पातें।
पटाक्षेप होना है तम के अंधकार का, सर पे जो हाथ होगा सद्गुरू का सत्य का दर्शन तो होना है।


- डॉ.संतोष सिंह