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Hymn No. 498 | Date: 11-Dec-1998
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ॐ मैं है सब कुछ, ॐ बिन अधुरा है यें जग सारा ।
ॐ मैं है सब कुछ, ॐ बिन अधुरा है यें जग सारा ।
प्रकट हुये है ॐ से, स्थित होके लय हो जान है ॐ में।
आश्रित है हम सब इसके यें कहलाता निराकार।
ॐ को जीसनें जान, उसीनें प्रभु को पहचाना ।
ॐ में ही शुन्य है, शुन्य में ॐ ही स्थिर है ।
ॐ से है सब कुछ, ॐ के बिना ना है कूछ ।
जीतना सुनाऊँ इसकी कथा, ऊतना ही अधुरा लगें ।
जिसनें ॐ को किया आत्मसात, उसनें जान ब्रह्माण्ड के अबूझ रहस्यों को ।
अधुरा है मेरा ज्ञाना, परम प्रभु की कथा का कर ना सकता संपूर्ण बरवान ।
ॐ ये ंपरम् ब्रम्ह का नाद है, भीतर और बाहर इसकी गुंज है ।
पार नहीं पा सकता कोई इसके बिना, पार जान है इसके द्वारा।
- डॉ.संतोष सिंह
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आवाज दें रहा हूँ तूझे मन ही मन, पहुंचे या ना पहुंचे तू सुन रहा होगा जरूर।
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बहुत सहा अपने कीयसें व्रूर कर्मों की सजा।
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