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Hymn No. 499 | Date: 13-Dec-1998
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बहुत सहा अपने कीयसें व्रूर कर्मों की सजा।
बहुत सहा अपने कीयसें व्रूर कर्मों की सजा।
फिर भी तौबा ना किया अपनीं करनी से ।
भेद रहा सदा कथनी – करनी में, विभ्रम का जाल बूना मन में ।
कहीं दूर गहराइयों में फसतें चला गया मैं बनके ।
इस अंधेरी दुनिया में प्रकाश की कीरन दिखलायीं।
कृपा हुयीं सद्गुरू की, उसके छत के नीचे खुद को पाया ।
सब कुछ भूलाकें जुडना उसनें सबसे सीखाया ।
हमारें इस नीसमय जीवन को आनंदमय उसें बनाया ।
हालत अब है ऐसी हमारी, पल भर को चैन ना आयें दिल को।
मिलन चाहता हूँ उससे, त्यागनें को तैयार है हम सब कूछ ।


- डॉ.संतोष सिंह