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Hymn No. 501 | Date: 14-Dec-1998
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झूठ बोला है सबसे मैंने, तुझसे ना कभी बोला ।
झूठ बोला है सबसे मैंने, तुझसे ना कभी बोला ।
हाँ तूझे वचन देंके, कई बार मैंने उसे तोड़ा ।
संकट सें घिर जाने पे, प्रभु तूझे सारी रात सताया।
सुख के क्षणो में अनेकों अनेक बार तुझको हमनें भूलाया ।
काबील कीसी और से तेरे करीब रहनें के मैं नहीं ।
कीतना दयालू है तू, हमें करीब आनें देता है अपने ।
साकार करता है हमारें दिल के हर खाबों को ।
तेरी हर सजा हितकर होती है हमारें वास्तें।
व्रूर हम है जो सब कुछ देखकें, तन के पिंजरे में सोते है।
अपने कर्मों की सजा पातें ही दोष देनें लगतें है तूझे ।


- डॉ.संतोष सिंह