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Hymn No. 502 | Date: 14-Dec-1998
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हें। जगानें चला मैं तूझे, प्रभु खुद सोया हूँ कई बरसों से ।
हें। जगानें चला मैं तूझे, प्रभु खुद सोया हूँ कई बरसों से ।
अपनी तद्रां तोड़ने वास्ते, तूझे सुबहो – शाम पुकारता हूँ मैं।
जो शाश्वत है सदीयों से, आकार देनें चला मैं उसे ।
विडंबना देख मन की, जो स्थापीत है उसे स्थापीत करनें चला ।
प्रभु तेरी दुनिया में मुझ जैसे, कीतनें मुरख आकें चलें गये ।
गुहार इस नादान की सून लें तू, हमें हमारें भीतर से जगा दें ।
सोनें का फिर कभी ध्यान ना आयें, हर काम में तेरा ध्यान हो।
गुजरनें को गुजरें रात – दिन, हमें तेरे बिना चैंन ना आयें ।
कुछ भी घट जाये इस जीवन में, तेरे कृपा समझकें कायम रहे भक्ति पे तेरे ।
बिन फेरे में पड़े सब कूछ निभाते जाये जीवन में पर दिल तेरे फेरें मे रहे ।
सुखद हो या दुखद हर क्षण कानों में गुंजे अमृत से बोल तेरे ।
दिल से अपनी हुयीं आँसूओं की कली तेरे चरणों में चडाउँढ आजन्म में ।
- डॉ.संतोष सिंह
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झूठ बोला है सबसे मैंने, तुझसे ना कभी बोला ।
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