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Hymn No. 504 | Date: 15-Dec-1998
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मैं रमना चाहता हूँ तुझमें, तू जैसे बसा दे वैसे बस जान चाहता हूँ ।
मैं रमना चाहता हूँ तुझमें, तू जैसे बसा दे वैसे बस जान चाहता हूँ ।
हर नुक्ताचीनी को छोडके, तेरे अनुरूप ढलके तूझे अपनाना चाहता हूँ ।
पतली है हालत मेरी, सुधर जायंगी जो तेरे चरणो की चुटकी भर धुली मिल जायेगी।
मुरझायें हुये मेरे जीवन में खिल जायेगा तेरे नाम का सुमन – सौरभ ।
आहत हुआ है, कई बार दिल मेरा, दुनिया भरकें गमों से ।
चाहत मेरी बडती जा रहीं है तेरे आगोश में समा जाने के लिये ।
कुछ भी ना हूँ, ना ही हकदार कीसीका, नाहक परेशां करता हूँ तूझे ।
जीवन का हर पन्ना दागदार है मेरा, पर मेरे आँखों की बूंदे है सच्ची ।
मैं लायक नहीं तेरे चणो में जगह पानें के लिये, पर उन्हें टपकनें दे देना तेरे श्री में ।
यें दिल मेरा बडा निष्ठूर है, देना है तो दे दें सारें जमानें का गम मुझे उढफ तकना - चरणों में।
पर कृपा तू करना इतना मुझपे श्वास दूर श्वास तेरे नाम का जाम पीता रहू मैं ।
मुझे पुष्प की ना है कामना, बस मेरा मन तेरे यादों मे गुम हो जाये ।
- डॉ.संतोष सिंह
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