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Hymn No. 505 | Date: 16-Dec-1998
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मंथन चल रहा है, हमारे भीतर संसार की हर बात को लेपे ।
मंथन चल रहा है, हमारे भीतर संसार की हर बात को लेपे ।
पार पाना मुश्किल नजर आता है, इच्छाओsं के सागर से ।
सुशुप्त कामनायें जन्म लेती रहती है, लालसाओं के रूप में ।
घोर कर्म कर बैठतें है, उसे पुरा करनें के चक्कर में ।
सांसारिक हितों का ध्यान रहता है, सब का अहित कर बैठते है ।
जुडने से दूर अलगाव के रौ में बहते चलें जाते है ।
तेरे नाम रूपी पतवार हाथ में होतें हुये, भी रोना रोतें है कीस्मत का।
सब कुछ का अंत देखा कीतनी बार, फिर भी आँखे मुंदके सोतें है हम ।
दृडता आ रहीं है तेरे प्रति, तेरी कृपा से।
इस दर को छोड़े, तेरे दर पे आगे बैठकें गुजारान है यें जीवन।
- डॉ.संतोष सिंह
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मैं रमना चाहता हूँ तुझमें, तू जैसे बसा दे वैसे बस जान चाहता हूँ ।
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