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Hymn No. 528 | Date: 29-Dec-1998
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कसकें चिपट जाना चाहता हूँ तेरी बाहो में छुडा ना सकें कोई मुझे ।
कसकें चिपट जाना चाहता हूँ तेरी बाहो में छुडा ना सकें कोई मुझे ।
तेरे लब को चुम लेना चाहता हूँ, परवाह कीये बगैर जमानें की।
हो जाऊँ मैं तेरा, भेद ना कर सके कोई मुझमें और तुझमें ।
तेरी सलामती में चाहता हूँ मैं तुझसे, मुझ जैसे कुर्बान होतें रहे तूझपे ।
जन्नत की सारी खुशीयाँ मिलती है तो ठुकरा दूँ, तेरे चरणों में जगह पानें के लिये।
इक् बार आगोश में समा लें मुझें, मैं अस्तित्वहीन हो जाना चाहता हूँ ।
मेरे लिये सबसे बड़ी राहत की यें बात है की तू मेरे करीब है।
मैं मुरींद तेरा सदियों पुराना, ना मिला अब तक तेरं दर पे ठीकाना ।
काबील नहीं देनें के लिये तेरा इम्तहाँ देना तूझे ही होगा मेरा इम्तहां ।
रूखसत ना कर मुझे तू, तेरी हर चीज से जुड गया है मेरा दिल ।
जमानें भर की दुःख सौंप दें तू मुझे, ऊफ तक ना करेंगे जो डूब चुके है हम तुझमें ।
भेद मिट चुका है हर विशेष का चोरों और बहार बह रहीं है तेरे ............... का।
- डॉ.संतोष सिंह
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लूटा दूँ तूझपे सर्वस्व अपना, जो कुछ पाया है तुझसे ।
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