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Hymn No. 538 | Date: 01-Jan-1999
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क्यां करूं मुझे कुछ ना पता, जो तू कराना चाहें, वहीं मैं करना चाहूँ ।
क्यां करूं मुझे कुछ ना पता, जो तू कराना चाहें, वहीं मैं करना चाहूँ ।
कस दें तू मुझपे तेरी लगाम, तेरा इशारा पाकें इस ओर चल दूँ मैं।
मुझे मेरी स्वतंत्रता में परतंत्र होनें का बोध होता है।
रख लें तू मोहें तेरी चाकरी में हो जाऊँगा स्वतंत्र में ।
कठिन से कठिन हर कार्य को पुरा करेंगे, जो दिल जुड जाये तुझसे ।
तन – मन के बंधन को त्याग दूँ, पैसे सर्प उतार फेंकता हौ अपनी केंचुल को।
तेरी भक्ति में डूब जाये हम, तन – मन की विवशताओं में जकडने से पहले।
कीसी कोनें से में नजर ना आऊँ, इतना चड जाये तेरा रंग मुझपे ।
रोम – रोम मेख झुमें, तेरे संग रहनें के अहसास से ।
इन प्राणों को लॉज के तेरे चरणों में, हर दूरियाँ मिटा दूं तेरे मेरे बीच का।


- डॉ.संतोष सिंह