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Hymn No. 539 | Date: 01-Jan-1999
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ज्ञान और प्रेम की चर्चा चली दिल में इक् दिन।
ज्ञान और प्रेम की चर्चा चली दिल में इक् दिन।
कौन है बेहतर ईश्वर के घर जाने के लिये ।
अकड के ज्ञान ने कहाँ मेरे आगे कोई नहीं है टिका।
मैं दर्शन कराता हूँ सत्य से सदा, झूठ दुम दबाकें भागे मुझसे ।
मुझमें करूणा किंचित मात्र ना है, जो किया वो तो है भोगना।
मैंने कीसी को ना है छोडा, धरा पे प्रभू आयें उन्होंने स्वीकारा मुझे ।
सब कुछ बनता मिटता मेरे सामनें, मेरे आगे कीसीकी ना चलती ।
मुझे क्या नहीं पातें बड़े – बड़े राजा – मुनी, मैं हूँ सबसे निराला।
ज्ञान की बातें सुनकें, प्रेम मुस्कुरायाँ हाथ जोडके कहाँ मुझे कुछ ना पता।
मैं तो दीवाना, जिसपे दिल आया उसपे मैं छाया।
प्रभु के जग में प्रभु के सिवाय कोई नहीं, अच्छें बुरें का भेद मैं समझ ना पाऊँ।
गत जो बननीं हौ मेरी बननें दें, मैं तो खोया हूँ प्यारे प्रभु में ।
ऐसे भी जाना, वैसे भी जाना, कोई ना टिका हूँ, हर कोई सिमटा प्रभु में ।
अपनी विशेषताओं को छोडना पड़ता है, प्रभु को पानें के लिये, प्रभु के समरस होना पड़ता है।
ज्ञान की धार पहुँचें या प्रेम की धार, प्रभु के पास पहुंच के प्रभुमय होना पड़ता है।
अपने मैं का त्याग करके, प्रभु कें घर जाना होता है ।


- डॉ.संतोष सिंह