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Hymn No. 540 | Date: 01-Jan-1999
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कैसे तू मुस्कुराता है इतना, हम चाहकें भी मुस्करा नहीं पातें ।
कैसे तू मुस्कुराता है इतना, हम चाहकें भी मुस्करा नहीं पातें ।
सदा से तेरी बातें करते है, पर तेरी बात चाहकें भी समझ नहीं पातें ।
आता है तू हमारें करीब, रूप बदल – बदलकें हम पहचान नहीं पातें ।
जुडना चाहते है हम तुझसे, जुड नहीं पाते, संग रहता है तू हमारें ।
फिर तुझसे दूर होनें का अहसास क्यों होता है, दिल को, ये खराश कब दूर होगी।
हम दुनिया भरकें हर सुखको है भोगतें, दुख आने पे फिर क्यों है रोते ।
कब ढलेंगे, तेरे सदृश, दुनिया के कर्मों को निभातें हुये ।
दूष्कर नजर आता है, प्रभु जीवन का हर पहलु, मन के लिये क्याँ कहना ।
सीधा सरल दिल बिचारा, इन सबका मार खाता सदा ।
काटों का ताज देना है तो दे दें, तेरे दर का पता बतातें जा।
हम पहुंच ना पायें तो क्याँ से, दिल नें जो ठाना बिन् पहुंचे मानेंगा नहीं ।


- डॉ.संतोष सिंह