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Hymn No. 545 | Date: 02-Jan-1999
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काका नाम का सुरमा लग गया जो आँखों में, तो कैसे दिखायी दें कुछ भी सिवाय उसके ।
काका नाम का सुरमा लग गया जो आँखों में, तो कैसे दिखायी दें कुछ भी सिवाय उसके ।
आधंर हो गयी है मेरी दुनिया, उसकें बिना सब कूछ लागें मुझको सुना।
बहुत हो चुकी है जबानी बातें, अब तो दिल के आँखों से है उसे देखना।
उसकें सामनें नहीं कुछ है ठहरता, आँधे चुधियाँ जात है देखतें ही उसको ।
दिल की भाषा है वो समझता, अंधकार से भरे मन को उसका ही रूप सुहाता।
नित्यें नयें दुनिया के मायावी रूप देखकें हूँ थक जाता, थकता नहीं दिल जब रूप उसकी है नजर।
मुझें ना चाहीयें यें अतरंगी दूनिया, जब बदरंगी छायीं हो आँखो में हमारें ।
दिल की नजरों से देखना हूँ बेहतर समझता, अगर उसमें खुदा का नूर हो समाया।
हर हालत में मैं इक् सा रहूँ, ना आयें कभी नजरों में मेरे भेद।
ऐं परम् मैं तुझसे इतना जुड जाऊँ, जो तू दीखायें बस वहीं मुझको नजर आयें ।


- डॉ.संतोष सिंह